गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

स्वर विज्ञानं

स्व्र विज्ञानं

स्वर विज्ञानं क्या है
्वर शास्त्र प्राचीन भारतीय ऋषि- मुनियों के द्वारा दिया गया योग का ऐसा अदभूत उपहार है, जो हमारे शरीर और मन पर बहुत तीव्र गति से असर करता है। यह रोग मुक्त करने के साथ मानसिक संतुलन एवम व्यवहारिक दुनियाँ में संघर्ष के योग्य बनाता है। ऐसा भी कह सकते है कि यह योग के इस सीक्रेट फार्मूला कि ओर बहुत से लोंगो का ध्यान नही जा पाता है। यह प्राणायाम का ही एक प्रकार है, जो सांसों (स्वर ) को पकड कर कार्य करताहै और धीरे- धीरे आपके जीवन को बदल कर रख देता है 
आधारभूत तथ्य 
श्वांस क्रमश : चलती है - बाएं नासपुट से, फिर दायें नासपुट से या दायें से बाएं। बाएं नासपुट से चलने बाली श्वांस को चंद्र -स्वर एवम दायें नासपुट से चने बाली श्वांस को सुर्य -स्वर कहते है। कभी- कभी दोनो नाकं से श्वांस चलती है, जिसे शुसुमना कहते है। जिस नासिका से सरल रुप से सांस निकलती हो उसे उसी नासिका का श्वांस कहेंगे। दिन और रात में बारह बार बायीं नासिका से एवम बारह बार दायीं नासिका से श्वांस चलन करता है।
श्वांस बदलने कि विधि
श्वांस जिस नासिका से चल रही है, उसके विपरीत नाकं में श्वांस को चलाने या बदलने का तरीका जानना आवयश्क है। साधारण प्रयास से यह समझ आने लगेगा कि विपरीत नासिका में सांस को कैसे चला सकते है। जिस नासिका से श्वांस चल रही हो उस नासिका को अंगूठे से ---
दबाना चाहियें और दुसरी नासिका से ही श्वांस को लेना और छोड़ना जारी रखना चाहियें। ऐसा दस-पन्द्रह मिनट शुरु में और धीरे- धीरे आधा से एक घंटे भी किया जा सकता है। दिन में दो- तिन बार भी समय मिलने पर कर सकते है, बस ध्यान रहे कि रीढ़ कि हड्डी सीधी कर बैठना चाहिएँ एवम पेंट भरा नही होना चाहिएँ। एक सप्ताह के अभ्यास से ही इच्छानुसार श्वांस बदलने में सफलता मिल जति है। जिस नाकं से सांस लिया जा रहा हो, उसी करवट सोने से भी नासिका पलट जाती है। एक सप्ताह मे ही यह अनुभव हो जाता है कि शरीर ओर मन का कूडा- करकट साफ हो रहा है तथा एक स्वत: स्फूर्त उर्जा आवेशित कर रही है।
लाभ
श्वांस सशरीर और आत्म शरीर का बेताज बादशाह है। शरीर से जीव जुडा है। ब्रह्माण्ड लय बद्ध सांस ले रहा है। विश्वा, आकाश -पाताल, नदी, पहाड़ , वयक्त-अवयक्त सभी अंतर्संब्न्धित है - एक दुसरे पर असर डाल रहे है। लगातार अभ्यास से मानसिक शक्ति से ही श्वांस को बदला जा सकता है। दिन में एक बार रोज श्वांस बदलना चाहिऐ - यही अभ्यास है। साथ ही नीच दिए गये उपायों को भी आजमाना लाभदायक
रहेगा --

०१ / सो - कर उठने के उपरांत जिस ओर कि नासिका चल रही है, उस ओर का पैर जमीन रखकर पलंग पर से उतरना चाहिऐ। सम्पूर्ण दिन
अच्छा रहेगा।

०२/घर से बाहर निकलते समय जिस ओर कि नासिका चल रही है,दरवाजे के बाहर पहला कदम उसी पैर का होना चाहिऐ। कार्य सिद्ध होगा।
०३/बाया स्वर चन्द्रमा कि श्वास है, जो शांति और प्रेम का प्रतीक है। यदि किसी से प्रेम प्रकट करना है तो श्वांस को बाएं स्वर में बदल
कर जाइये , सफल होंगे । यदि आप शक्ति पर्दरष्ण करने जा रहें है तो दया स्वर चलना चाहियें ।
०४/आपके शारीर में हरारत हो, सरदी -जुकाम हो या मामूली बुखार - श्वांस कि गति बदल दीजिए । शीघ्र ही आराम होगा । दिन में तीन-
चार बार भी कर सकते है।
०५/यदि आधा -सीसी सिरदर्द हो तो जिस तरफ का सिर दर्द हो , उसके विपरीत हाथ कि कोहनी को किसी कपडे या टावेल से तेज बाँध
दीजिए एवम श्वांस को बदल देने से जल्दी आराम मिलेगा।