मंगलवार, 13 सितंबर 2016

गृहस्थ आश्रम

बह । हमारे समाज में श्रेष्ठ आश्रमों में एक है इसको सबसे उपर श्रेष्ठ श्रेणी में रखा गया है गृहस्थ आश्रम क्या है और यह समाज के सभी आश्रमों मे श्रेष्ठ आश्रम गृहस्थ आश्रम क्यो माना गया है इसपर हम विस्तार पूर्वक निचे चर्चा करते हैं और इसकी विषेशताओ पर विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं इसका लाभ हमे कैसे प्राप्त होता है तथा इसकी मौलिक अधिकार मे हम रहकर कैसे अपने कर्मों को उच्च तथा भलि भात से परोपकार और हर धर्मों मे इसको उच्च तथा समाजिक एेकता का एक प्रमुख हिस्सा तथा संसार कल्याण का वरदान मानते हैं गृहस्थ जीवन का हिस्सा है यह आश्रम और सभी समाजिक कल्याण तथा संयुक्त परिवार की एक परिभाषा है इस आश्रम पर विस्तार पूर्वक विश्लेषण करते है। हमारे समाज में श्रेष्ठ आश्रमों में एक है इसको सबसे उपर श्रेष्ठ श्रेणी में रखा गया है गृहस्थ आश्रम क्या है और यह समाज के सभी आश्रमों मे श्रेष्ठ आश्रम गृहस्थ आश्रम क्यो माना गया है इसपर हम विस्तार पूर्वक निचे चर्चा करते हैं और इसकी विषेशताओ पर विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं इसका लाभ हमे कैसे प्राप्त होता है तथा इसकी मौलिक अधिकार मे हम रहकर कैसे अपने कर्मों को उच्च तथा भलि भात से परोपकार और हर धर्मों मे इसको उच्च तथा समाजिक एेकता का एक प्रमुख हिस्सा तथा संसार कल्याण का वरदान मानते हैं गृहस्थ जीवन का हिस्सा है यह आश्रम और सभी समाजिक कल्याण तथा संयुक्त परिवार की एक परिभाषा है इस आश्रम पर विस्तार पूर्वक विश्लेषण करते है।
गृहस्थ आश्रम - गृहस्थ आश्रम परिवार के कल्याण के साथ हमारे जीवन निर्वाह के कारक सभी परिवारों का एक समूह व सभी कार्य सभी का कल्याण के लिए हमारे समाज को बनाने में सभी दुखों का उपाय तथा संयुक्त परिवार का संरक्षण तथा सभी क्रम सभी कृया धर्म परोपकार दया दान धार्मिकता समाज कल्याण दुख सुख हिम्मत भलाई कठिनाइयों का सामना करना सुखो का आभाष तथा मोक्ष की प्राप्ति कर्मो का उत्थान जीवन जीने की कला हम और हमारा समाज इत्यादि आदि सभी प्रकार के कर्मो का ही आश्रमों ही गृहस्थ आश्रम कहलाता है
गृहस्थ जीवन - गृहस्थ जीवन का निर्वाह जीवन यापन करने की कला हम और परिवार की तरक्की समाज का उदय इसी से बना हुआ है गृहस्थ जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है सुख दुःख का आभास होता है यह परिवार के प्रति रुचिकर होकर उनका पालन पोषण तथा उनके साथ मिलकर कठिनाइयों का सामना करने के लिए हमें गृहस्थ जीवन में ही मिलता है इसके प्रति हमारा नुकसान फायदा सभी प्रकार की विपत्तियों का सामना करना पड़ता है और उससे संघर्ष करना पड़ता है परिवार का पालन करने के लिए हमें स्वस्थ रहने के लिए सभी प्रकार के भुख प्यास के लिए तत्पर रहना पड़ता है और उसकी कमियों को पूरा करने के लिए हमें संघर्षरत रहना पड़ता है इसमे दया धार्मिक विश्वास दान विश्वास के साथ समाजिक कार्यरत रहना पड़ता है और वह किसी भी स्थिति में सुधार के लिए हर प्रयत्न करना पड़ता है हमारे समाजिक परिवारिक गतिविधियों का ग्यान करते हुए उसके हर सदस्य को एकसुत्र धागे में बाधना पडता है गृहस्थ जीवन जहाँ हमे दुखों का सामना सुखों की अनुभूति होती है तथा कठीन से कठीन समय का सामना करना पड़ता है उससे सभी को उभारते हुए उसका सामना करना पड़ता है यह जीवन सुखमय और दुखमय कि आनुभुति करता है यही है गृहस्थ जीवन
समाज - समाज की स्थापना भी यही से शुरू हुई और हमारे द्वारा संचालित करने के लिए हर ब्यवस्थित समारोह हो या प्रजा तन्त्र हो जो यही से शुरू होती है समाज समूहों को कहते हैं तो प्रथम तो परिवार ही समाज है और यह इसकी सिढी है जहां से हम चढकर पूरे समाज की स्थापना होती है
लाभ - पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मोक्ष, ईश्वर, देश, काल, और हमारे कर्म, साधना, ज्ञान, विवाह, सांस्कृति रहन सहन, समाजिक स्थापना, इत्यादि, 
लाभ - गृहस्थ जीवन में जीवन जीने की कला प्राप्त होती है तथा समय का सदुपयोग कर जीवन को कैसे बदलाव लाने के लिए हमें इसी मे रहकर जीवन के प्रति हर पहलू पर उतार चढ़ाव के साथ हमे ज्ञान और मनुष्य का कर्तव्य का आनन्द आभास होता है तथा जन समुदाय का ज्ञान होता है इसके साथ ही प्यार दुलार मनुष्यता पर गर्व महसूस यही से होता है इसमें त्याग और परिश्रम का आभास होता है कैसे सबको संयोजा जाता है और उसका निर्वाह कैसे किया जाता है सभी प्रकार से मनुष्यी ज्ञान यही से प्राप्त होता है।
धर्म - धर्म का अर्थ होता है जिवन के नियामतक तत्व हमारे रहन सहन रिति रिवाज से धर्म परिभाषित होता है हमारे संस्कृति हमारे संस्कार जो धर्म से परिभाषित होते हैं। जहां हमारे समाज में बहुत से धर्म है पुरे संसार में हर जगह हर देश का अलग अलग धर्म है लेकिन धर्म चाहे जो भी हो लेकिन सिखने को यही गृहस्थ जीवन से ही मिलता है पैदा होने के साथ जब हमे ज्ञान होता है कि हम मनुष्य जाति है और हमारा समाज धर्म क्या है ये सब बातें हमें यही से पता चलताी है तथा इसका ज्ञान होता है
काम -काम का अर्थ होता है जिवन की वैध कामनाएं हरेक मनुष्य के अन्दर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है हिन्दू वैदिक पुराण के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व मे जो एक अविभक्त तत्व था वह विश्ववरचना के लिए दो विरोधी भावो में आ गया इसी को भारतीय विश्वास मे यो कहा जाता है कि आरम्भ में प्रजापति अकेला था उसका मन नही लगा उसने अपने शरीर के दो भाग मे लिया वह आधे भाग स्त्री और आधे भाग पुरुष बन गया तब उसने आनंद का अनुभव किया वहीं से इसकी एक संज्ञा हमने आप को दी लेकिन जो भी इतिहास रहा हो सभी का ज्ञान हमे इसी गृहस्थ आश्रम या गृहस्थ जीवन में ही मिलती है हिन्दू वैदिक काल में इसका पूरा वर्णन किया गया है कि पारस्परिक आकर्षण ही काम का वास्तविक स्वरूप है प्राकृतिक रचनाओं में प्रत्येक स्त्री के भितर पुरुष की सत्ता है और प्रत्येक पुरुष के भितर स्त्री की सत्ता है ऋग्वेद मे इस तत्व की इसपष्ट स्वीकृति दी गयी है इस तत्व को अर्वाचीन मनोविज्ञान शास्त्री भी मानते हैं जो भी परिभाषित हो तथ्य यही जो भी काम का ज्ञान हमे होता है सब इसी गृहस्थ जीवन में ही होता है
अर्थ - अर्थ का मतलब होता है जीवन के भौतिक साधन अर्थ का अनर्थ हो गया है सही को गलत बताया है सभी प्रकार के परिभाषित शब्द का एक अर्थ होता है या यू कहे जीवन जीने का अर्थ क्या है और हम अपने उद्देश्य का क्या परिभाषित करना चाहते हैं हमारे जीवन की पद्धति को कैसे जीते हैं और उसका मतलब क्या है उसी को अर्थ से परिभाषित कर सकते हैं जहा भी हमे बदलाव की जरूरत होती है उसका भी एक अर्थ होता है कि किस लिये हमे बदलाव की जरूरत पडी जो भी
हो सभी को अपने जीवन का एक उद्देश्य और उसका अर्थ होना चाहिए जो कुछ अर्थ से सम्बंधित है जिसका ज्ञान हमे इसी गृहस्थ जीवन में होता है
धर्म - धर्म का अर्थ है जीवन के नियमों का तत्व ही धर्म से परिभाषित होता है
क्रोध - क्रोध मनुष्य जाति की सबसे कमजोर प्रवृति है जहा हमे इससे दुस परिणामों का सामना करना पड़ता है वही इससे हमारे सेहत पर प्रभाव पडता है क्रोध का कारण अपनी कमजोरी है जो अपने कर्तव्यो का निर्वाह नहीं करते हैं और अपनी प्रतिक्रियाएं को या जिम्मेदारीयो को दूसरे पर ठोकते है क्रोध का कारण बन जाती है जो भी हो क्रोध हमे अपनी जिम्मेदारीयो के द्वारा उसका निर्वाह के प्रति इसी आश्रम का ही दायित्व रूप है जो गृहस्थ जीवन की देन है।
लोभ - लोभ भी यही से परिभाषित होती है लोभ जो परिवारिक जिम्मेदारी से आता है क्रोध हमे अपनी जिम्मेदारीयो के द्वारा उसका निर्वाह के प्रति इसी आश्रम का ही दायित्व रूप है जो गृहस्थ जीवन की देन है। मन निरमुल आशंकाऔ से घिरा रहता है कि हमारे शरीर के भौतिक सुख की प्राप्ति की कामना के साथ हर भौतिक सुविधाओं का हम अधिक से अधिक भोग करना चाहते हैं जिसके कारण हमे लोभ की उपज होती है और यह आज के दौर में परिवारिक सुख सुविधाओं की देन है परिवार की आकांक्षाओं को पूर्ण करना लोभ की एक मनोदशा है
मोह माया - मोह माया की उपज भी इसी गृहस्थ जीवन में उपज होती है और उसका परिवारिक सम्बन्ध है मोह हमारे जीवन में तब पाया जाता है जहा एक सूली की प्यार की उत्पत्ति हुई जहां अपना पराया का आभास हुआ जहां अपने भौतिक सुखो का उपयोग हुआ मन की जिज्ञासा को शांति नही मिली और उसको और बढाया जहां पति-पत्नी परिवार माता पिता औलाद स्त्रियां सभी के प्रति प्यार की उपज मोह माया है जो परिवारजनों के प्रति उनको सुख सुविधाओं का प्रदान करना है इश्वर रूपी मे जहा मोह माया को मोक्ष के लिए प्रबंधित किया है वही इसको कारण भी माना है मोह जहां आता है वहा भौतिक सच का कारण होता है आज के इस दौर में जहां भौतिकवाद हमें जकड़ रखा है और इसके प्रति हमारी जिज्ञासा और फैल रही है सांसारिक संसाधन जहाँ मोह को अपने मजबूत बनाने मे लगा है वही हम पुराने समय का जीवन स्तर को छोडते जा रहे हैं अपनी संस्कार को पिछे छोडते जा रहे हैं इन्सान की काम  लालसा दैत्यिक रूप लेता जा रहा है भौतिक हम पर भारी होता जा रहा है जो न सिर्फ हमारे वाद को खत्म कर रहा है बल्कि हमारे अन्तर आत्मा को भी व्यक्त विभक्त कर रहा है इसी परिवारिक का एक प्रमुख हिस्सा है मोह माया जो गृहस्थ आश्रम में एक लालच की वजह और भौतिक सुख सुविधाओं का कारण बन गया है जो हमें इसी गृहस्थ जीवन में प्राप्त होता है
मोक्ष - मोक्ष का अर्थ होता है सभी प्रकार के बन्धन से मुक्ति ही मोक्ष की प्राप्ति होती है इसका ज्ञान गृहस्थ जीवन में रहते हुए ही हमे इसका ज्ञान होता है और हम इस परिवारिक तथा समाजिक बन्धनो से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति होगी लेकिन हमारे मोक्ष को हमारे कर्त्तव्य के आधार पर मिलनी चाहिए इस लिए हमारे पुराणों में कुछ तथ्य दिये गये हैं कि मानव जाति सभी जातियों के कर्मो के आधार पर ही फल मिलते हैं तो कर्म ही मनुष्य का वह मार्ग है जहाँ से हमे मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है और इंसान बुरा भला करने परोपकार करने सत्य का निवारण करने अपने को सही रास्ते द्वारा इश्वर के प्रति रुचिकर होकर पुरुषोत्तम मर्यादाओं के नियमों के पालन करके अहम को त्याग कर इंसान की भलाई करके अपने कर्मो को अच्छा बनाता है और उसे फल के प्राप्ति के बिना हमेशा सच्चा ओर सदा अग्रसर रहता है जैसे कि हमारे गीता उपदेश मे कहा गया है कि कर्म करो फल की चिंता मत करो फल तो अपने आप मिलते रहेगे और केवल तुम अपना कर्म करते जाओ इसी प्रकार सत्य के साथ आपको सही उपयोग कर अपने आप ही ईश्वरीय मोक्ष को प्राप्त होगा जो गृहस्थ आश्रम में या गृहस्थ जीवन में अपने जिम्मेदारीयो का सत्य के साथ निर्वाह करता है उसको सब प्रकार के मोक्ष की प्राप्ति होती है
ईश्वर या प्रभु भगवान - इश्वर के रूप के बारे में अनेक ऐसी धारणाए है जो भगवान के अलग अलग रुपो को प्रदर्शित करती है लेकिन सब का एक ही सत्य है कि इस जगत को उसी के द्वारा रचा गया जहां हमे इस बात के लिए हमें अलग अलग धारणाओ के आधार पर इस बात को सत्यापित करने के लिए सभी धर्मो की गहराई तक जा कर उसकी ब्याखान करेगे तो एक ही परिणाम मिलते हैं कि इश्वर जगत ब्यापत है इश्वर के रूप अलग अलग परिभाषित हुए हैं कही इश्वर को आकार रुप दिया गया कही इनके रुपो को अलौकिक कहा गया कही इनको जगत के कण ब्यापत माना गया लेकिन धारणाए जो भी हो सब का विश्वास प्रभु के उपर है आज के इस युग में जहां विज्ञान हमे कुछ ऐसी होनी को परिभाषित नही कर पाया है कि जो इतिहास है उसका वास्तविक परिणाम था या है वह उस तक नही पहुंच सकता जैसे कई बार पृथ्वी का डगमगाने का उसके होने का अनुमान बस लगाता है भुक्म्म की स्थिति को वह रोक नही सकता मनुष्य के मृत्यु पर विजय प्राप्त नही कर सकता है जो न सिर्फ हमारे मन को परिमाणित करता है वरन यह क्षैतिज के धरा पर कुछ यैसी प्रतिक्रियाएं है जो वह चाह कर भी वह वहा तक नही पहुंच सकता है हिन्दू धर्म के अनुसार जगत ब्याप्त इश्वर के अनेक रूप है वह जगत के हर कण कण मे बसा है और उसके बिना पत्ता भी नही हिल सकता है सृष्टि रचियता पालन करता व उसका अन्त रुप देना यह सब ईश्वरीय कारक है इश्वर के रूप को सिद्ध करना है तो इसमे इस बात की पुष्टि करनी होगी कि क्यू नहीं माने जो है या नही इसको क्या हमारे विज्ञान युग सिद्ध कर पाये हैं और क्या उनकी पकड इस सृष्टि पर हो गयी है हमारे जीवन की पद्धति इस शरीर मे विद्वमान है मनुष्य का दिमाग ब्रह्माण्ड है जो कुछ वह करता है और वह जो कुछ खोज करता है वह इसी की उपज है शरीर की क्रिया तरल पदार्थ के वजह से है उसी के द्वारा संचालित होती है वह दृष्टि से देखता है और जो वह नही देख पाता उसे वह जानता भी नही और मानता भी नही तो क्या हम जहाँ तक देखते हैं वही सत्य है और बाकी कुछ नहीं है ईश्वर के प्रति हमारे अर्थ शास्त्री हो या मनोवैज्ञानिक हो या समाज शास्त्री हो या दर्शन शास्त्री हो सब के अलग अलग तौर पर रास्ते बताये गये हैं और वह किसी भी स्थिति को नियंत्रित निर्देश माध्यम दिये हैं लेकिन हमारी संस्कृति हो या विरासत में दी गयी परिभाषाएं हो सब की एक ही बात उतपन्न की स्थिति है वह है ईश्वर तो ईश्वर एक शब्द नही हो सकता है जो पुरे संसार में हर धर्म हर संस्कृतिकर्मी मे बसा पडा है यह आज नहीं वरन कई युगों से हमारे हर शब्द मे आता है और आता रहेगा दिन रात पृथ्वी का घुमना चक्कर लगाने का कारण क्या है और वह क्यू है जल थल आकाश वायु धरा की उत्पत्ति कैसे हुई और क्यू हुया संसार में मनुष्य बनाया स्त्रियों को क्यू बनाया कैसे बना पशु पक्षी जिव जन्तु हर कण क्यू बनाया जहां तक विज्ञान का परिभाषित परिणाम हमको सिद्ध नही कर पाए कुछ उदाहरण के द्वारा केवल अनुमानित है तो अनुमान क्या वह तो एक मस्तिष्क की उपज है और कुछ नहीं हर प्राणी का निरन्तर कण ब्याप्त अग्रसर होता रहता है कुछ ऐसी मृत्यु कोशिकाओं है जिनका विकास होता रहता है और वह हमेशा से है और उनकी पकड जगत ब्याप्त ईश्वर नियम से है जो सदा ही ब्याप्त कर विस्तारित है उनका होना कोई संयोग नही है और वह संयोग हो ही नहीं सकता जिसका ईश्वरीय कारक है
ईश्वर की परिभाषा जो भी दी गई है और कारक जो भी रहा हो इसका ज्ञान का कारण हमे गृहस्थ आश्रम में ही मिलता है और इसकी उपज हमे गहन चिंतन की स्थिति को पैदा करती है गृहस्थ आश्रम या गृहस्थ जीवन में ही प्राप्त होता है।
देश संसार -  सर्व प्रथम गृहस्थ जीवन के आधार पर समाज और समाज के आधार पर देश बनता है और देश से संसार बनता है तो सर्व प्रिय गृहस्थ जीवन के ही द्वारा संचालित हर प्रकार है
गृहस्थ जीवन को सबसे ऊपर रखते हुए हर कर्मो की शुरुआत होती है गृहस्थ जीवन के आधार पर ही हमे हर परिणाम हासिल होते हैं इसी के द्वारा हमारे कर्मो का फल मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति के लिए रास्ता मिलता है तो सभी ब्यवसथित व अब्यवस्थित सभी प्रकार गृहस्थ जीवन के द्वारा संचालित होते हैं
अन्त में सिद्ध करने के लिए हम इस निश्चित रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि गृहस्थ जीवन हमारी चाभी है जहा से हमे चलने की सिढी है। मन निरमुल आशंकाऔ से घिरा रहता है हर स्थिति उसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं और हमारा जीवन जीने की कला हम और हमारा समाज के लिए अन्त का परिणाम यही है कि गृहस्थ जीवन प्रथम पथ है और उसपे चल कर हम हर मार्ग तक पहुचेगे।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

स्वर-साधना का ज्ञान
परिचय-
जिस तरह वायु का बाहरी उपयोग है वैसे ही उसका आंतरिक और सूक्ष्म उपयोग भी है। जिसके विषय में जानकर कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति आध्यात्मिक तथा सांसरिक सुख और आनंद प्राप्त कर सकता है। प्राणायाम की ही तरह स्वर विज्ञान भी वायुतत्व के सूक्ष्म उपयोग का विज्ञान है जिसके द्वारा हम बहुत से रोगों से अपने आपको बचाकर रख सकते हैं और रोगी होने पर स्वर-साधना की मदद से उन रोगों का उन्मूलन भी कर सकते हैं। स्वर साधना या स्वरोदय विज्ञान को योग का ही एक अंग मानना चाहिए। ये मनुष्य को हर समय अच्छा फल देने वाला होता है, लेकिन ये स्वर शास्त्र जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल है इसको सिखाने वाला गुरू मिलना। स्वर साधना का आधार सांस लेना और सांस को बाहर छोड़ने की गति स्वरोदय विज्ञान है। हमारी सारी चेष्टाएं तथा तज्जन्य फायदा-नुकसान, सुख-दुख आदि सारे शारीरिक और मानसिक सुख तथा मुश्किलें आश्चर्यमयी सांस लेने और सांस छोड़ने की गति से ही प्रभावित है। जिसकी मदद से दुखों को दूर किया जा सकता है और अपनी इच्छा का फल पाया जाता है।
प्रकृति का ये नियम है कि हमारे शरीर में दिन-रात तेज गति से सांस लेना और सांस छोड़ना एक ही समय में नाक के दोनो छिद्रों से साधारणत: नही चलता। बल्कि वो बारी-बारी से एक निश्चित समय तक अलग-अलग नाक के छिद्रों से चलता है। एक नाक के छिद्र का निश्चित समय पूरा हो जाने पर उससे सांस लेना और सांस छोड़ना बंद हो जाता है और नाक के दूसरे छिद्र से चलना शुरू हो जाता है। सांस का आना जाना जब एक नाक के छिद्र से बंद होता है और दूसरे से शुरू होता है तो उसको `स्वरोदय´ कहा जाता है। हर नथुने में स्वरोदय होने के बाद वो साधारणतया 1 घंटे तक मौजूद रहता है। इसके बाद दूसरे नाक के छिद्र से सांस चलना शुरू होता है और वो भी 1 घंटे तक रहता है। ये क्रम रात और दिन चलता रहता है।
जानकारी-
जब नाक से बाएं छिद्र से सांस चलती है तब उसे `इड़ा´ में चलना अथवा `चंद्रस्वर´ का चलना कहा जाता है और दाहिने नाक से सांस चलती है तो उसे `पिंगला´ में चलना अथवा `सूर्य स्वर´ का चलना कहते हैं और नाक के दोनो छिद्रों से जब एक ही समय में बराबर सांस चलती है तब उसको `सुषुम्ना में चलना कहा जाता है।
स्वरयोग-
योग के मुताबिक सांस को ही स्वर कहा गया है। स्वर मुख्यत: 3 प्रकार के होते हैं-
चंद्रस्वर-
जब नाक के बाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसको चंद्रस्वर कहा जाता है। ये शरीर को ठंडक पहुंचाता है। इस स्वर में तरल पदार्थ पीने चाहिए और ज्यादा मेहनत का काम नही करना चाहिए।
सूर्यस्वर-
जब नाक के दाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसे सूर्य स्वर कहा जाता है। ये स्वर शरीर को गर्मी देता है। इस स्वर में भोजन और ज्यादा मेहनत वाले काम करने चाहिए।
स्वर बदलने की विधि-
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चल रहा हो तो उसे दबाकर बंद करने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से स्वर चल रहा हो उसी तरफ करवट लेकर लेटने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चलाना हो उससे दूसरी तरफ के छिद्र को रुई से बंद कर देना चाहिए।
ज्यादा मेहनत करने से, दौड़ने से और प्राणायाम आदि करने से स्वर बदल जाता है। नाड़ी शोधन प्राणायाम करने से स्वर पर काबू हो जाता है। इससे सर्दियों में सर्दी कम लगती है और गर्मियों में गर्मी भी कम लगती है।
स्वर ज्ञान से लाभ-
जो व्यक्ति स्वर को बार-बार बदलना पूरी तरह से सीख जाता है उसे जल्दी बुढ़ापा नही आता और वो लंबी उम्र भी जीता है।
कोई भी रोग होने पर जो स्वर चलता हो उसे बदलने से जल्दी लाभ होता है।
शरीर में थकान होने पर चंद्रस्वर (दाईं करवट) लेटने से थकान दूर हो जाती है।
स्नायु रोग के कारण अगर शरीर मे किसी भी तरह का दर्द हो तो स्वर को बदलने से दर्द दूर हो जाता है।
दमे का दौरा पड़ने पर स्वर बदलने से दमे का दौरा कम हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिन में बायां और रात में दायां स्वर चलता है वो हमेशा स्वस्थ रहता है।
गर्भधारण के समय अगर पुरुष का दायां स्वर और स्त्री का बायां स्वर चले तो उस समय में गर्भधारण करने से निश्चय ही पुत्र पैदा होता है।
जानकारी-
प्रकृति शरीर की जरूरत के मुताबिक स्वरों को बदलती रहती है। अगर जरूरत हो तो स्वर बदला भी जा सकता है।
वाम स्वर
परिचय-
जिस समय व्यक्ति का बाईं तरफ का स्वर चलता हो उस समय स्थिर, सौम्य और शांति वाला काम करने से वो काम पूरा हो जाता है जैसे- दोस्ती करना, भगवान के भजन करना, सजना-संवरना, किसी रोग की चिकित्सा शुरू करना, शादी करना, दान देना, हवन-यज्ञ करना, मकान आदि बनवाना शुरू करना, किसी यात्रा की शुरूआत करना, नई फसल के बीज बोना, पढ़ाई शुरू करना आदि।
दक्षिण स्वर
परिचय-
जिस समय व्यक्ति का दाईं तरफ का स्वर चल रहा हो उस समय उसे काफी मुश्किल, गुस्से वाले और रुद्र कामों को करना चाहिए जैसे- किसी चीज की सवारी करना, लड़ाई में जाना, व्यायाम करना, पहाड़ पर चढ़ना, स्नान करना और भोजन करना आदि।
सुषुम्ना
परिचय-
जिस समय नाक के दोनों छिद्रों से बराबर स्वर चलते हो तो इसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं। उस समय मुक्त फल देने वाले कामों को करने से सिद्धि जल्दी मिल जाती है जैसे- धर्म वाले काम में भगवान का ध्यान लगाना तथा योग-साधना आदि करने चाहिए।
विशेष-
जो काम `चंद्र और `सूर्य´ नाड़ी में करने चाहिए उन्हे `सुषुम्ना´ के समय बिल्कुल भी न करें नही तो इसका उल्टा असर पड़ता है।
स्वर चलने का ज्ञान
परिचय-
अगर कोई व्यक्ति जानना चाहता है कि किस समय कौन सा स्वर चल रहा है तो इसको जानने का तरीका बहुत आसान है। सबसे पहले नाक के एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। फिर इस छिद्र को बंद करके उसी तरह से दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। नाक के जिस छिद्र से सांस लेने और छोड़ने में आसानी लग रही हो समझना चाहिए कि उस तरफ का स्वर चल रहा है और जिस तरफ से सांस लेने और छोड़ने मे परेशानी हो उसे बंद समझना चाहिए।
इच्छा के मुताबिक सांस की गति बदलना
परिचय-
अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से अपनी सांस की चलने की गति को बदलना चाहता है तो इसकी 3 विधियां है-
सांस की गति बदलने की विधि-
नाक के जिस तरफ के छेद से सांस चल रही हो, उसके दूसरी तरफ के नाक के छिद्र को अंगूठे से दबाकर रखना चाहिए तथा जिस तरफ से सांस चल रही हो वहां से हवा को अंदर खींचना चाहिए। फिर उस तरफ के छिद्र को दबाकर नाक के दूसरे छिद्र से हवा को बाहर निकालना चाहिए। कुछ देर तक इसी तरह से नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने से सांस की गति जरूर बदल जाती है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से सांस चल रही हो उसी करवट सोकर नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से छोड़ने की क्रिया को करने से सांस की गति जल्दी बदल जाती है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो सिर्फ उसी करवट थोड़ी देर तक लेटने से भी सांस के चलने की गति बदल जाती है।
प्राणवायु को सुषुम्ना में संचारित करने की विधि :
परिचय-
प्राणवायु को सुषुम्ना नाड़ी में जमा करने के लिए सबसे पहले नाक के किसी भी एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से सांस लेने की क्रिया करें और फिर तुरंत ही बंद छिद्र को खोलकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर निकाल दीजिए। इसके बाद नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस छोड़ी हो, उसी से सांस लेकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर छोड़िये। इस तरह नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने और फिर दूसरे से सांस लेकर पहले से छोड़ने से लगभग 50 बार में प्राणवायु का संचार `सुषुम्ना´ नाड़ी में जरूर हो जाएगा।
स्वर साधना का पांचो तत्वों से सम्बंध
परिचय-
हमारे शरीर को बनाने में जो पांच तत्व (आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल) होते हैं उनमें से कोई ना कोई तत्व हर समय स्वर के साथ मौजूद रहता है। जब तक स्वर नाक के एक छिद्र से चलता रहता है, तब तक पांचो तत्व 1-1 बार उदय होकर अपने-अपने समय तक मौजूद रहने के बाद वापिस चले जाते हैं।
स्वर के साथ तत्वों का ज्ञान
परिचय-
स्वर के साथ कौन सा तत्व मौजूद होता है, ये किस तरह कैसे जाना जाए पंचतत्वों का उदय स्वर के उदय के साथ कैसे होता है और उन्हे कैसे जाना जा सकता है। इसके बहुत से उपाय है, लेकिन ये तरीके इतने ज्यादा बारीक और मुश्किल होते हैं कि कोई भी आम व्यक्ति बिना अभ्यास के उन्हे नही जान सकता।
जैसे-
नाक के छिद्र से चलती हुई सांस की ऊपर नीचे तिरछे बीच में घूम-घूमकर बदलती हुई गति से किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है।
हर तत्व का अपना एक खास आकार होता है। इसलिए निर्मल दर्पण पर सांस को छोड़ने से जो आकृति बनती है उस आकृति को देखकर उस समय जो तत्व मौजूद होता है, उसका पता चल जाता है।
शरीर में स्थित अलग-अलग चक्रों द्वारा किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जाता है।
हर तत्व का अपना-अपना एक खास रंग होता है। इससे भी तत्वों के बारे में पता लगाया जा सकता है।
हर तत्व का अपना एक अलग स्वाद होता है। उसके द्वारा भी पता लगाया जा सकता है।
सुबह के समय तत्व के क्रम द्वारा नाक के जिस छिद्र से सांस चलती हो उसमे साधारणत: पहले वायु, फिर अग्नि, फिर पृथ्वी इसके बाद पानी और अंत में आकाश का क्रमश: 8, 12, 20, 16 और 4 मिनट तक उदय होता है।
जानकारी-
तत्वों के परिमाण द्वारा भी किसी तत्व की स्वर के साथ मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। इसका तरीका ये है कि बारीक हल्की रुई लेकर उसे जिस नाक के छिद्र से सांस चल रही हो, उसके पास धीरे-धीरे ले जाइए। जहां पर पहले-पहले रुई हवा की गति से हिलने लगे वहां पर रुक जाए और उस दूरी को नाप लीजिए। यदि वो दूरी कम से कम 12 उंगली की निकले तो पृथ्वी तत्व 16 अंगुल है, जल तत्व 4 अंगुल है, अग्नि तत्व 8 अंगुल है और वायु तत्व 20 अंगुल है तो आकाश तत्व की मौजूदगी समझनी चाहिए।
स्वर साधना के चमत्कार और उससे स्वास्थ्य की प्राप्ति
परिचय-
असल जिंदगी मे स्वर की महिमा बहुत ही ज्यादा चमत्कारिक है। इसके कुछ सरल प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं।
जानकारी-
सुबह उठने पर पलंग पर ही आंख खुलते ही जो स्वर चल रहा हो उस ओर के हाथ की हथेली को देखें और उसे चेहरे पर फेरते हुए भगवान का नाम लें। इसके बाद जिस ओर का स्वर चल रहा हो उसी ओर का पैर पहले बिस्तर से नीचे जमीन पर रखें। इस क्रिया को करने से पूरा दिन सुख और चैन से बीतेगा।
अगर किसी व्यक्ति को कोई रोग हो जाए तो उसके लक्षण पता चलते ही जो स्वर चलता हो उसको तुरंत ही बंद कर देना चाहिए और जितनी देर या जितने दिनो तक शरीर स्वस्थ न हो जाए उतनी देर या उतने दिनो तक उस स्वर को बंद कर देना चाहिए। इससे शरीर जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है और रोगी को ज्यादा दिनों तक कष्ट नही सहना पड़ता।
अगर शरीर में किसी भी तरह की थकावट महसूस हो तो दाहिने करवट सो जाना चाहिए, जिससे `चंद्र´ स्वर चालू हो जाता है और थोड़े ही समय में शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है।
स्नायु रोग के कारण अगर शरीर के किसी भाग में किसी भी तरह का दर्द हो तो दर्द के शुरू होते ही जो स्वर चलता हो, उसे बंद कर देना चाहिए। इस प्रयोग को सिर्फ 2-4 मिनट तक ही करने से रोगी का दर्द चला जाता है।
जब किसी व्यक्ति को दमे का दौरा पड़ता है उस समय जो स्वर चलता हो उसे बंद करके दूसरा स्वर चला देना चाहिए। इससे 10-15 मिनट में ही दमे का दौरा शांत हो जाता है। रोजाना इसी तरह से करने से एक महीने में ही दमे के दौरे का रोग कम हो जाता है। दिन में जितनी भी बार यह क्रिया की जाती है, उतनी ही जल्दी दमे का दौरा कम हो जाता है।
जिस व्यक्ति का स्वर दिन में बायां और रात मे दायां चलता है, उसके शरीर में किसी भी तरह का दर्द नही होता है। इसी क्रम से 10-15 दिन तक स्वरों को चलाने का अभ्यास करने से स्वर खुद ही उपर्युक्त नियम से चलने लगता है।
रात को गर्भाधान के समय स्त्री का बांया स्वर और पुरुष का अगर दायां स्वर चले तो उनके घर में बेटा पैदा होता है तथा स्त्री-पुरुष के उस समय में बराबर स्वर चलते रहने से गर्भ ठहरता नही है।
जिस समय दायां स्वर चल रहा हो उस समय भोजन करना लाभकारी होता है। भोजन करने के बाद भी 10 मिनट तक दायां स्वर ही चलना चाहिए। इसलिए भोजन करने के बाद बायीं करवट सोने को कहा जाता है ताकि दायां स्वर चलता रहे। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है और व्यक्ति को कब्ज का रोग भी नही होता। अगर कब्ज होता भी है तो वो भी जल्दी दूर हो जाता है।
किसी जगह पर आग लगने पर जिस ओर आग की गति हो उस दिशा में खड़े होकर जो स्वर चलता हो, उससे वायु को खींचकर नाक से पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से या तो आग बुझ जाएगी या उसका बढ़ना रुक जाएगा।
जने स्वर विज्ञान का मर्म
अखण्ड ज्योति Dec 1999 | View Scanned Copy | | Report Discrepancies
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स्वर योग शरीर क्रियाओं को संतुलित और स्थिर रखने की एक प्राचीन विधा है। इससे स्वस्थता को अक्षुण्ण बनाए रखना सरल -संभव हो जाता है। योग के आचार्यों के अनुस्वार यह एक विशुद्ध विज्ञान है, जो यह बतलाता है कि निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त भौतिक शक्तियों से मानव शरीर किस प्रकार प्रभावित होता है। सूर्य, चंद्र अथवा अन्यान्य ग्रहों की सूक्ष्म रश्मियों द्वारा शरीरगत परमाणुओं में किस प्रकार की हलचल उत्पन्न होती है। काया की जब जैसी स्थिति हो, तब उससे वैसा ही काम लेना चाहिए-यही स्वर योग का गढ़ रहस्य है। इतना होते हुए भी यह मनुष्य की सृजन शक्ति में हस्तक्षेप नहीं करता, वरन् उसे प्रोत्साहित ही करता है।
स्वरशास्त्र के अनुसार प्राण के आवागमन के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। शरीर में ऐसी नाड़ियों की संख्या 72000 है। इनको नसें न समझना चाहिए। यह प्राणचेतना प्रवाहित होने के सूक्ष्मतम पथ हैं नाभि में इस प्रकार की नाड़ियों का एक गुच्छक है। इसमें इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गाँधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा यशस्विनी, अलंबुसा, कुहू तथा शंखिनी नामक दस नाड़ियाँ हैं। यह वहाँ से निकलकर देह के विभिन्न हिस्सों में चली जाती हैं। इनमें से प्रथम तीन को प्रमुख माना गया हैं। स्वर योग में इड़ा को चंद्र नाड़ी या चंद्र स्वर भी कहते हैं। यह बायें नथुने में है पिंगला को सूर्य नाड़ी अथवा सूर्य कहा गया है। यह दायें नथुने में है। सुषुम्ना को ‘वायु’ कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य स्थित है। जिस प्रकार संसार में सूर्य और चंद्र नियमित रूप से अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करती हैं। शेष अन्य नाड़ियाँ भी भिन्न-भिन्न अंगों में प्राण संचार का कार्य करती हैं। गाँधार नाक में, हस्तिजिह्वा दाहिनी आँख में, पूषा दायें कान में, यशस्विनी बायें कान में, अलंबुसा मुख में, कुहू लिंग प्रदेश में और शंखिनी गुदा में जाती है।
हठयोग में नाभिकंद अर्थात् कुण्डलिनी का स्थान गुदा से लिंग प्रदेश की ओर दो अंगुल हटकर मूलाधार चक्र में माना गया है। स्वर योग में वह स्थिति माननीय न होगी। स्वर योग शरीर शास्त्र से संबंध रखता है और शरीर की नाभि गुदामूल में नहीं, वरन् उदर मध्य ही हो सकती हैं। इसीलिए यहाँ नाभिप्रदेश का तात्पर्य उदर भाग मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर से ही है।
योग विज्ञान इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य को नाभि तक पूरी साँस लेनी चाहिए। वह प्राणवायु का स्थान फेफड़ों को नहीं, नाभि को मानता है। गहन अनुसंधान के पश्चात् अब शरीरशास्त्री भी इस बात को स्वीकारते हैं कि वायु को फेफड़ों में भरने मात्र से ही श्वास का काम पूरा नहीं हो जाता। उसका उपयुक्त तरीका यह है कि उससे पेड़ू तक पेट सिकुड़ता और फैलता रहे एवं डायफ्राम का भी साथ-साथ संचालन हो। तात्पर्य यह कि श्वास का प्रभाव नाभि तक पहुँचना जरूरी है। इसके बिना स्वास्थ्य लड़खड़ाने का खतरा बना रहता है। इसीलिए सामान्य श्वास को योग विज्ञान में अधूरी क्रिया माना गया है। इससे जीवन की प्रगति रुकी रह जाती है। इसकी पूर्ति के लिए योग के आचार्यों ने प्राणायाम जैसे अभ्यासों का विकास किया। इसका इतना ही अर्थ है कि प्राणवायु नाभि तक पहुँचें और वहाँ से निकलने वाली दसों नाड़ियों में प्राण का प्रवाह उचित मात्रा में हो। आधुनिक शरीरशास्त्री योगशास्त्र में वर्णित इन नाड़ियों को, चीर-फाड़कर देह में ढूँढ़ने का प्रयास करते और नहीं मिलने पर उस पर अविश्वास करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि ये रक्त संचार से संबंधित रक्तवाहिनी नहीं, वरन् प्राण संचार से जुड़े हुए अत्यंत सूक्ष्म मार्ग हैं, जिन्हें यंत्रों से नहीं, सूक्ष्म दृष्टि से ही देख पाना संभव है।
स्वर विज्ञान पर सतर्क दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि नासिका स्वर नियमित अंतराल में बदलते रहते और थोड़े ही क्षण के लिए साथ-साथ चलते हैं। यही सुषुम्ना नाड़ी की गतिशील अवस्था हैं। शेष समय में इड़ा-पिंगला बारी-बारी से चलती हैं। जो क्रमशः बायें-दायें नासिका स्वर द्वारा निरूपित होती हैं। इनका प्रवाह प्रायः हर घंटे में बदलता रहता है। जिस प्रकार समुद्र की लहरों पर सूर्य और चंद्र का प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार नासास्वरों को भी वे प्रभावित करते हैं। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी अर्थात् बायाँ स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है, जबकि कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को अरुणोदय काल में पिंगला नाड़ी या दांया स्वर चलता है। उक्त नियमानुसार स्वरों का बदलना शारीरिक -मानसिक स्वस्थता की निशानी है। इसमें किसी प्रकार का व्यतिक्रम यह सूचित करता है कि सब कुछ निर्विघ्न और नैसर्गिक रूप में नहीं चल रहा है। यह असामान्य अवस्था और रोग की स्थिति है।
अर्जुन ने भगवान से नाता जोड़ा, पर वह मजबूत तभी हो सका जब उसने अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाया। भीतर से दीन-दयनीय और कृपण कायरों की तरह बना हुआ अर्जुन रथ पर बैठा, गाण्डीव हाथ में लिए यह सोच ही नहीं पा रहा था कि मैं क्या करूँ? महाभारत का उद्देश्य भाइयों के झगड़े-टंटे का निबटाना नहीं था वरन् सामंतवादी बिखराव के कारण भारत के स्तर व भविष्य निरंतर चिंताजनक बनते जाने की जटिल समस्या का दूरगामी समाधान प्रस्तुत करना था। कृष्ण का उद्बोधन इसी निमित्त था। एक बार व्यामोह मिटा तो फिर अनीति पर विजय के रूप में ही उसकी परिणति हुई। अर्जुन स्वयं अपना, विश्वमानव का हित साध सकने में सफल हुआ, साथ ही अपनी मुक्ति का पथ भी उसने प्रशस्त कर लिया।
किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि पंद्रह दिन तक बिलकुल एक-सी गति से ही स्वर चलेगा। चंद्र-सूर्य की गतियों और रश्मियों का प्रभाव उसमें परिवर्तन पैदा करता है। अस्तु, शुक्लपक्ष की प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा-इन तिथियों में सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी या चंद्र स्वर चलना चाहिए एवं शेष चतुर्थी, पंचमी षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशी को इस काल में सूर्य स्वर चलना प्राकृतिक, शुभ और स्वास्थ्यकारी माना गया है। इसी प्रकार कृष्णपक्ष में हर तीन दिन सूर्योदय के समय एक निश्चित स्वर ही चलना चाहिए-यह नैसर्गिक नियम है।
सूर्य-चंद्र के अतिरिक्त अन्य ग्रहों का भी प्रभाव स्वरों पर असर डालता है। तदनुसार कुछ वारों में उनमें विशिष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। चंद्र (सोम), बुध, गुरु और शुक्र इन चारों में और विशेषकर शुक्लपक्ष में बायाँ स्वर चलना शुभ और स्वास्थ्यकर है, जबकि रवि, मंगल एवं शनि को कृष्णपक्ष में दाहिनी नाड़ी चलना उत्तम है। रविवार को सूर्योदय पर सूर्य नाड़ी और सोमवार को चंद्र नाड़ी चलना आरोग्यवर्धक माना गया है। आकाश स्थित प्रधान ग्रहों का प्रभाव उनकी अपनी तथा पृथ्वी की चाल के अनुसार भूमंडल पर आता है। अपनी धुरी पर घूमने के अतिरिक्त एक निर्धारित मार्ग से पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा के लिए भी चलती रहती है। इस मार्ग में प्रधान ग्रहों की कुछ महत्वपूर्ण किरणें प्रायः एक के बाद एक स्पष्ट रूप से आगे आती हैं। अन्य दिनों में वे किरणें अन्य ग्रहों की आड़ में रुक जाती हैं। खगोल विद्या के इस अत्यंत सूक्ष्म तत्त्वज्ञान को समझते हुए प्राचीन आचार्यों ने वारों के नाम उनके अधिपति ग्रहों की प्रमुखता के आधार पर रखे थे। सूर्य और चंद्र नाड़ियों पर शुक्ल एवं कृष्णपक्ष की धन-ऋण विद्युत एवं वारों के अधिपति ग्रहों का जो प्रभाव स्वरों पर होता है, वह प्रातःकाल देखा जा सकता है। उपर्युक्त दिनों में स्वरों एवं नाड़ियों की भिन्नता दृष्टिगोचर होने का कारण मनुष्य शरीर पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों का सूर्य-चंद्र युक्त प्रभाव ही है। जो ग्रह सूर्य से समता रखते हैं, वे सूर्य स्वर को और जो चंद्र से समता रखते है, वे चंद्र स्वर को प्रभावित-उत्तेजित करते हैं।
सर्वविदित है कि चंद्रमा का गुण शाँत-शीतल एवं सूर्य का उष्ण है। शीतलता से स्थिरता गंभीरता, विवेक प्रभृति गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुणों का आविर्भाव होता है। मनुष्य को साँसारिक जीवन में शांतिपूर्ण और शौर्य एवं साहसपूर्ण दोनों प्रकार के काम करने पड़ते हैं। किसी भी कार्य का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर हैं। इसलिए विवेकी पुरुष अपने कामों को प्रारंभ करते समय यह भली-भाँति सोच-विचार लेते हैं कि हमारे शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति इस प्रकार के काम करने के अनुकूल है या नहीं? एक विद्यार्थी को रात्रि में उस समय पाठ याद करने के लिए दिया जाए, जब उसकी स्वाभाविक स्थिति निद्रा चाहती है, तो वह पाठ को अच्छी तरह याद न कर सकेगा। यदि वही पाठ उसे प्रातःकाल की अनुकूल स्थिति में दिया जाए, तो आसानी से सफलता मिल जाएगी। ध्यान, भजन, चिंतन मनन, पूजन के लिए एकांत की आवश्यकता है; किंतु उत्साह भरने और युद्ध में प्रवृत्त होने के लिए उत्तेजक वातावरण की जरूरत पड़ती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए हुए कार्य अवश्य फलीभूत होते हैं। इसी आधार पर स्वरयोगियों ने निर्देश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए। अध्ययन, मनन, चिंतन, उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
इसके विपरीत उत्तेजक और आवेश एवं जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनके लिए सूर्य स्वर उत्तम कहा गया है। अपराध, अन्याय, अत्याचार, परिश्रम रतिकर्म, ध्वंस, हत्या आदि कार्यों में दुस्साहस की आवश्यकता पड़ती है। यह पिंगला नाड़ी से ही उपलब्ध हों सकता है। यहाँ इन वर्जनाओं का समर्थन या निषेध नहीं है। शास्त्रकार ने तो एक वैज्ञानिक की तरह विश्लेषण कर दिया है कि ऐसे कार्य उस वक्त अच्छे होंगे, जब सूर्य की उष्णता के प्रभाव से जीवन-तत्व उत्तेजित हो रहा हो। शाँत और शीतल मस्तिष्क से यह क्रूर और कठोर कर्म कोई भली प्रकार कैसे संपन्न कर सकेगा?
इन दो नाड़ियों के अतिरिक्त अल्पकाल के लिए तीसरी नाड़ी-सुषुम्ना भी क्रियाशील होती है। इस समय दायें-बायें स्वर दोनों साथ-साथ सक्रिय होते हैं। तब प्रायः शरीर संधि अवस्था में होता है। यह संध्याकाल है। दिन के उदय और अस्त को भी संध्याकाल कहते हैं। इस समय जन्म या मरण काल के समान पारलौकिक भावनाएँ मनुष्य में जाग्रत होती हैं और संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता एवं अरुचि होने लगती है। स्वर की संध्या से भी मनुष्य का चित्त साँसारिक कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों पर पश्चाताप स्वरूप खिन्नता प्रकट करता हुआ कुछ आत्मचिंतन की ओर झुकता है। यह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है और थोड़े समय के लिए आती है। इसलिए हम अच्छी तरह पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिंतन और ईश्वराधना का अभ्यास किया जाए तो निस्संदेह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है; किंतु साँसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं, अतएव सुषुम्ना स्वर में आरंभ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता। वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं। सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा -बहुत उदय होता है, अस्तु इस समय में दिए हुए शाप-वरदान अधिकाँश फलीभूत होते हैं, कारण कि उन भावनाओं के साथ आत्मतत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है।
कई बार एक ही स्वर लंबे समय तक लगातार चलता रहता है। यह ठीक नहीं। दाहिने या सूर्य स्वर के साथ यदि यह स्थिति आती है, तो इससे शारीरिक उष्णता बढ़ते जाने के कारण जीवन तत्व सूखने लगता है। फलतः कमजोरी आती एवं कार्यक्षमता घटती जाती है; आलस्य, अनुत्साह बढ़ने लगता तथा आयु क्षीण होने लगती है। इसके विपरीत बायें स्वर के लगातार चलते रहने से उसके शीतल होने के कारण शारीरिक स्वस्थता अवश्य प्रभावित होती है। ऐसी दशा में स्वर संतुलन के प्रति जागरूक और सचेष्ट रहना चाहिए और विकारग्रस्त स्वर को ठीक करने का प्रयास करना चाहिए।
अस्थायी रूप से स्वर बदलने के कितने ही तरीके है, जिनमें कुछ निम्न हैं-जिस स्वर को चलाना हो, उसके विपरीत करवट बदलकर थोड़ी देर उस अवस्था में लेटे रहने से स्वर बदल जाता है।
जो स्वर चल रहा हो, उस ओर काँख में हथेली को थोड़ी देर दबाए रखने से स्वर परिवर्तित हो जाएगा।
चलित स्वर में स्वच्छ रुई पतले स्वच्छ कपड़े में लपेटकर उसकी गोली रखने से स्वर बदलता है।
स्वर परिवर्तन के यह तात्कालिक उपाय हैं। रोगग्रस्त स्वर संभव है कि इन पद्धतियों से बदलकर थोड़ी देर पश्चात् पुनः पुराने क्रम में आ जाए। ऐसी दशा में विकार को दुरुस्त करने के लिए योगशास्त्र में कुछ प्रभावशाली तरीके बताए गए हैं, जिनके नियमित अभ्यास से स्वर संतुलन स्थापित हो जाता है। इनमें शाँभवी मुद्रा और त्राटक प्रमुख है। शाँभवी मुद्रा अधिक प्रभावी तकनीकी है और संतुलन शीघ्रतापूर्वक आता है। इसके अतिरिक्त प्राणचिकित्सा के अंतर्गत श्वासोच्छवास भी एक कारगर तरीका है, जिसके द्वारा स्वर विकार दूर किया जा सकता है।
श्वास का लंबा-छोटा होना भी सुनिश्चित लाभ-हानि का द्योतक है। स्वस्थ साँस का साधारण माप शास्त्रों में 12 अंगुल बताया गया है। इससे अधिक लंबी हानिकारक तथा छोटी लाभप्रद है। सोते समय इसकी लंबाई 30 अंगुल हो जाती है। इसलिए 6-7 घंटे से अधिक सोना अच्छा नहीं। भोजन के समय इसका नाप 20 अंगुल हो जाता है। अतएव बार-बार भोजन करना भी उचित नहीं। इससे लंबे समय तक लंबी साँस चलने से आयु घटती है। बीमारियों में इसकी लंबाई काफी अधिक बढ़ जाती है, जिसके कारण प्राण का क्षरण होने लगता है और दुर्बलता बढ़ने लगती है।
प्राणियों के साँस की संख्या भी जीवन की लघुता और दीर्घता को दर्शाती है। मनुष्य दिन-रात में प्रायः 216000 श्वास लेता है। इससे कम साँस लेने वाले प्राणी उसी अनुपात में दीर्घजीवी होते हैं। प्रति मिनट आदमी की साँस गति 13 है और उसकी उम्र 100 वर्ष। खरगोश प्रति मिनट 38 बार एवं आयु 8 वर्ष। कुत्ता 29 बार, वय 12 वर्ष। साँप 8 बार, उम्र 1000 वर्ष। कछुआ 5 बार, जीवन 2000 वर्ष।
प्राणायाम के अभ्यासी अपनी श्वसन गति को नियंत्रित कर लेते हैं, इसलिए वे दीर्घजीवी होते हैं। इसके अतिरिक्त गहरी साँस लेना, कमर सीधी रखकर बैठना एवं अचिंतनीय चिंतन से बचे रहना भी ऐसे कारक है, जो स्वास्थ्य संवर्द्धन और दीर्घजीवन को सुनिश्चित करते हैं। नाभि तक गहरी साँस लेने से एक प्रकार का कुँभक होता और श्वास संख्या घट जाती है। मेरुदंड के भीतर एक जीवन तत्व प्रवाहित होता है, जो सुषुम्ना को बलवान बनाता और मस्तिष्क को परिपुष्ट रखता है। कमर झुकाकर बैठने से इस प्रवाह में गतिरोध पैदा होता है। अचिंत्य चिंतन से साँस की गति तीव्र हो जाती है जो उम्र घटने का प्रधान कारण है।
स्वर शास्त्र के आचार्यों का मत है कि सोते समय चित्त लेटने से सुषुम्ना प्रवाह अवरुद्ध होने का खतरा रहता है। इसमें अशुभ तथा भयानक स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। इसीलिए भोजनोपरान्त प्रथम बायें, फिर दायें करवट लेटना चाहिए।
शीतलता से अग्नि मंद पड़ जाती है और उष्णता से तीव्र होती है। यह प्रभाव हमारी जठराग्नि पर भी पड़ता है। सूर्य स्वर में पाचनशक्ति उद्दीप्त रहती है, अतएव उसी स्वर में भोजन करना उत्तम है तथा भोजन के पश्चात् भी कुछ समय उसी स्वर को सक्रिय रखना चाहिए। इससे पाचनक्रिया अच्छी प्रकार हो जाती है।
इस प्रकार स्वर विज्ञान के मर्म और महत्व को समझकर कोई भी व्यक्ति अपनी स्वस्थता को लंबे समय तक बनाए रख पाने में सफल हो सकता है। प्रकृति की मनुष्य को यह अनुपम देन है। इसका समुचित लाभ उठाया जाना चाहिए।

अनुपम गुप्त विद्या

स्वर विज्ञान : एक अनूठी विद्या कब करें कौन सा काम !!


  1. स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद्या है।  इनके अनुसार स्वरोदय, नाक के छिद्र से ग्रहण किया जाने वाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है।
    स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में ला सकता है।
    स्वरोदय अपने आप में पूर्ण विज्ञान है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति अनेक लाभों से लाभान्वित होने लगता है। इसका लाभ प्राप्त करने के लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल श्वास की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है।
    यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।

    सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर
    ===============
    सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।
    इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।
    सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

    स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ
    ====================
    (1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।
    (2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।
    (3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

    जीवन में स्वर का चमत्कार
    ================
    स्वर विज्ञान अपने आप में दुनिया का महानतम ज्योतिष विज्ञान है जिसके संकेत कभी गलत नहीं जाते।
    शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं से लेकर दैवीय सम्पर्कों और परिवेशीय घटनाओं तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है।
    स्वर विज्ञान का सहारा लेकर आप जीवन को नई दिशा दृष्टि डे सकते है.
    दिव्य जीवन का निर्माण कर सकते हैं, लौकिक एवं पारलौकिक यात्रा को सफल बना सकते हैं। यही नहीं तो आप अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और क्षेत्र की धाराओं तक को बदल सकने का सामर्थ्य पा जाते हैं।
    अपनी नाक के दो छिद्र होते हैं। इनमें से सामान्य अवस्था में एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायां तो कभी बांया। जिस समय स्वर बदलता है उस समय कुछ सैकण्ड के लिए दोनों नाक में हवा निकलती प्रतीत होती है। इसके अलावा कभी - कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय दोनों नासिक छिद्रों से हवा निकलती है। दोनों तरफ सांस निकलने का समय योगियों के लिए योग मार्ग में प्रवेश करने का समय होता है।
    बांयी तरफ सांस आवागमन का मतलब है आपके शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु प्रवाह है।
    इसके विपरीत दांयी नाड़ी पिंगला है।
    दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है।
    अपनी नाक से निकलने वाली साँस को परखने मात्र से आप जीवन के कई कार्यों को बेहतर बना सकते हैं। सांस का संबंध तिथियों और वारों से जोड़कर इसे और अधिक आसान बना दिया गया है।
    जिस तिथि को जो सांस होना चाहिए, वही यदि होगा तो आपका दिन अच्छा जाएगा। इसके विपरीत होने पर आपका दिन बिगड़ा ही रहेगा। इसलिये साँस पर ध्यान दें और जीवन विकास की यात्रा को गति दें।
    मंगल, शनि और रवि का संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष का संबंध चन्द्र स्वर से।
    आपके दांये नथुने से निकलने वाली सांस पिंगला है। इस स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है। यह गरम होती है।
    जबकि बांयी ओर से निकलने वाले स्वर को इड़ा नाड़ी का स्वर कहा जाता है। इसका संबंध चन्द्र से है और यह स्वर ठण्डा है।

    शुक्ल पक्ष:-

    • प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया बांया (उल्टा)
    • चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी -दांया (सीधा)
    • सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी बांया (उल्टा)
    • दशमी, एकादशी एवं द्वादशी –दांया (सीधा)
    • त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा – बांया (उल्टा)

    कृष्ण पक्ष:-
    • प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया दांया (सीधा)
    • चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी बांया (उल्टा)
    • सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी दांया(सीधा)
    • दशमी, एकादशी एवं द्वादशी बांया(उल्टा)
    • त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या --दांया(सीधा)

    सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथ की हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें।
    यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें।
    यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें।
    यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए, वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें।
    स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें।
    पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए।
    जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करे तब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठण्ढक अनुभव करेगा।
    जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा।
    जिस किसी व्यक्ति से कोई काम हो, उसे अपने उस तरफ रखें जिस तरफ की नासिका का स्वर निकल रहा हो। इससे काम निकलने में आसानी रहेगी।
    जब नाक से दोनों स्वर निकलें, तब किसी भी अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। इस समय ध्यान करें तो ध्यान जल्दी लगेगा।
    दक्षिणायन शुरू होने के दिन प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण शुरू होने के दिन प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं। कहा गया है - कर्के चन्द्रा, मकरे भानु।
    रोजाना स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, पहले स्वर देखें और जिस तरफ स्वर चल रहा हो उस तरफ से कपड़े पहनना शुरू करें और साथ में यह मंत्र बोलते जाएं - ॐ जीवं रक्ष। इससे दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा के लिए टल जाता है।
    आप घर में हो या आफिस में, कोई आपसे मिलने आए और आप चाहते हैं कि वह ज्यादा समय आपके पास नहीं बैठा रहे। ऎसे में जब भी सामने वाला व्यक्ति आपके कक्ष में प्रवेश करे उसी समय आप अपनी पूरी साँस को बाहर निकाल फेंकियें, इसके बाद वह व्यक्ति जब आपके करीब आकर हाथ मिलाये, तब हाथ मिलाते समय भी यही क्रिया गोपनीय रूप से दोहरा दें।
    आप देखेंगे कि वह व्यक्ति आपके पास ज्यादा बैठ नहीं पाएगा, कोई न कोई ऎसा कारण उपस्थित हो जाएगा कि उसे लौटना ही पड़ेगा। इसके विपरीत आप किसी को अपने पास ज्यादा देर बिठाना चाहें तो कक्ष प्रवेश तथा हाथ मिलाने की क्रियाओं के वक्त सांस को अन्दर खींच लें। आपकी इच्छा होगी तभी वह व्यक्ति लौट पाएगा।
    कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है। ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।
    कब करें कौन सा काम
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    ग्रहों को देखे बिना स्वर विज्ञान के ज्ञान से अनेक समस्याओं, बाधाओं एवं शुभ परिणामों का बोध इन नाड़ियों से होने लगता है, जिससे अशुभ का निराकरण भी आसानी से किया जा सकता है।चंद्रमा एवं सूर्य की रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। चंद्रमा का गुण शीतल एवं सूर्य का उष्ण है।
    शीतलता से स्थिरता, गंभीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण पैदा होते हैं। किसी भी काम का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर करता है। शरीर व मन की स्थिति, चंद्र व सूर्य या अन्य ग्रहों एवं नाड़ियों को भलीभांति पहचान कर यदि काम शुरु करें तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं।
    स्वर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए, जैसे विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठान कर्म, व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा, विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि ऐसे कार्य हैं कि जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता होती है।
    इसीलिए चंद्र स्वर के चलते इन कार्यो का आरंभ शुभ परिणामदायक होता है। उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। दाहिने नथुने से श्वास ठीक आ रही हो अर्थात सूर्य स्वर चल रहा हो तो परिणाम अनुकूल मिलने वाला होता है।

    दबाए मानसिक विकार
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    कुछ समय के लिए दोनों नाड़ियां चलती हैं अत: प्राय: शरीर संधि अवस्था में होता है। इस समय पारलौकिक भावनाएं जागृत होती हैं। संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता और अरुचि होने लगती है। इस समय में परमार्थ चिंतन, ईश्वर आराधना आदि की जाए, तो सफलता प्राप्त हो सकती है। यह काल सुषुम्ना नाड़ी का होता है, इसमें मानसिक विकार दब जाते हैं और आत्मिक भाव का उदय होता है।

    अन्य उपाय
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    यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।
    गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए।
    स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है।

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

स्वर-विज्ञान और बिना औषध रोगनाश के उपाय

स्वर-विज्ञान और बिना औषध रोगनाश के उपाय
विश्वपिता विधाता ने मनुष्य के जन्म के समय में ही देह साथ एक ऐसा आश्चर्यजनक कौशलपूर्ण अपूर्व उपाय रच दिया है , जिसे जान लेने पर सांसारिक , वैषायिक किसी भी कार्य में असफलता का दुःख नहीं हो सकता । हम इस अपूर्व कौशल को नहीं जानते । इसी कारण हमारा कार्य असफल हो जाता है , आशा भङु हो जाती है । हमें मनस्ताप और रोग भोगना पडता है । यह विषय जिस शास्त्र में है , उसे स्वरोदयशास्त्र कहते है
यह स्वरशास्त्र जैसा दुर्लभ है , स्वरज्ञ गुरु का भी उतना ही अभाव है । स्वरशास्त्र प्रत्यक्ष फल देने वाला है । मुझे पद -पद पर इसका प्रत्यक्ष फल देखकर आश्चर्यचकित होना पडा है । समग्र स्वरशास्त्र को ठीक -ठीक लिपिबद्ध करना बिलकुल असम्भव है । केवल साधकों के काम की कुछ बातें यहाँ संक्षेप में दी जा रही हैं ।
स्वरशास्त्र सीखने के लिये श्वास -प्रश्वास की गति के सम्बन्ध में सम्यक् ‍ ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है ।
कायानगरमध्ये तु मारुतः क्षितिपालकः ।‘ देहरुपी नगर में वायु राजा के समान है । ’ प्राणवायु ‘ निःश्वास ’ और ‘ प्रश्वास ’-- इन दो नामों से पुकारा जाता है । वायु ग्रहण करने का नाम निःश्वास ’ और वायु के परित्याग करने का नाम ‘ प्रश्वास ’ है । जीव के जन्म से मृत्यु के अन्तिम क्षण तक निरन्तर श्वास - प्रश्वास की क्रिया होती रहती है । यह निःश्वास नासिका दे दोनों छेदों से एक ही समय एक साथ समानरुप से नहीं चला करता । कभी बायें और कभी दाहिने पुत से चलता है । कभी - कभी एकाध घडी तक एक ही समय दोनों नाकों से समानभाव से श्वास प्रवाहित होता है ।
बायें नासापुट के श्वास को इडा में चलना , दाहिना नासिका के श्वास को पिंगला में चलना और दोनों पुटोम से एक समान चलने पर उसे सुषुम्नो में चलना कहते है । एक नासापुट को दबाकर दूसरे द्वारा श्वास को बाहर निकालने पर यह साफ मालूम हो जाता है कि एक नासिका से सरलतापूर्वक श्वास -प्रवाह चल रहा है और दूसरा नासापुट मानो बन्द है , अर्थात् ‍ उससे दूसरी नासिका की तरह सरलतापूर्वक श्वास बाहर नहीं निकलता । जिस नासिका से सरलतापूर्वक श्वास बाहर निकलता हो , उस समय उसी नासिका का श्वास कहना चाहिये । किस नासिका से श्वास बाहर निकल रहा है , इतको पाठक उपर्युक्त प्रकार से समझ सकते है । क्रमशः अभ्यास होने पर बहुत आसानी से मालूम होने लगता है कि किस नासिका से निःश्वास प्रवाहित होत है । प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय से ढाई -ढाई घडी के हिसाब से एक -एक नासिका से श्वास चलता है । इस प्रकार रात -दिन में बारह बार बायीं और बारह बार दाहिनी नासिका से क्रमानुसार श्वास चलता है । किस दिन किस नासिका से पहले श्वास -क्रिया होती है , इसका एक निर्दिष्ट नियम है । यथा --
आदौ चन्द्रः सिते पक्षे भास्करस्तु सितेतरे ।प्रतिपत्तो दिनान्याहुस्त्रिणि त्रीणि क्रमोदये ॥ (पवनविजयस्वरोदय )
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि तीन -तीन दिन की बारी से चन्द्र अर्थात् ‍ बायीं नासिका से तथा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि से तीन -तीन दिन की बारी से सूर्यनाडी अर्थात् ‍ दाहिनी नासिका से पहले श्वास प्रवाहित होता है । अर्थात् ‍ शुक्लपक्ष की प्रतिपदा , द्वितीया , तृतीया , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा -इन नौ दिनों में प्रातःकाल सूर्योदय के समय पहले बायीं नासिका से तथा चतुर्थी , पञ्चमी , षष्ठी , दशमी , एकादशी , द्वादशी -इन छः दिनों को प्रातःकाल पहले दाहिनी नासिका से श्वास चलना आरम्भ होता है और वह ढाई घडो तक रहता है । उसके बाद दूसरी नासिका से श्वास जारी होता है । कृष्णपक्ष की प्रतिपदा , द्वितीया , तृतीया , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , अमावास्या -इन नौ दिनों में सूर्योदय के समय पहले दाहिनी नासिका से तथा चतुर्थी , पञ्चमी , षष्ठी , दशमी , एकादशी , द्वादशी -इन छः दिनों में सूर्य के उदयकाल में पहले बायीं नासिका से श्वास आरम्भ होता है और ढाई घडी के बाद दूसरी नासिका से चलता है । इस प्रकार नियमपूर्वक ढाई -ढाई घडी तक एक -एक नासिका से श्वास चलता है । यही मनुष्य -जीवन में श्वास की गति का स्वाभविक नियम है ।
वहेत्तावद् ‍ घटीमध्ये पञ्चतत्त्वानि निर्दिशेत् ‍ । (स्वरशास्त्र )
प्रतिदिन रात -दिन की ६० घडियों में ढाई -ढाई घडी के हिसाब से एक -एक नासिका से निर्दिष्ट क्रम से श्वास चलने के समय क्रमशः पञ्चतत्त्वों का उदय होता है । इस श्वास -प्रश्वास की गति को समझकर कार्य करने पर शरीर स्वस्थ रहता है और मनुष्य दीर्घजीवी होता है , फलस्वरुप सांसारिक , वैषयिक -सब कार्यो में सफलता मिलने के कारण सुखपूर्वक संसार -यात्रा पूरी होती है ।
वाम नासिका (इडा नाडी ) खाआ श्वासफलजिस समय इडा नाडी से अर्थात् ‍ बायीं नासिका से श्वास चलता हो , उस समय स्थिर कर्मो को करना चाहिये । जैसे - अलंकारधारण , दूर की यात्रा , आश्रम में प्रवेश , राजमन्दिर तथा महल बनाना एवं द्रव्यादि का ग्रहण करना । तालाब कुआँ आदि जलाशय तथा देवस्तम्भ आदि की प्रतिष्ठा करना । इसी समय यात्रा , दान , विवाह , नया कपडा पहनना , शान्तिकर्म , पौष्टिक कर्म , दिव्यौषर्धसेवन , रसायनकार्य , प्रभुदर्शन , मित्रतास्थापन एवं बाहर जाना आदि शुभ कार्य करना चाहिये । बायीं नाक से श्वास चलने के समय शुभ कार्य पर उन सब कार्यो में सिद्धि मिलती है । परंतु वायु , अग्नि और आकाश तत्त्व के उदय के समय उक्त कार्य नहीं करना चाहिये ।
दक्षिण नासिका (पिङुला नाडी ) का श्वासफलजिस समय पिंगला नाडी अर्थात् ‍ दाहिनी नाक से श्वास चलता हो , उस समय कठिन कर्म करना चाहिये । जैसे ---कठिन क्रूर विद्या का अध्ययन और अध्यापन ,स्त्रेसंसर्ग , नौकदि आरोहण तान्त्रिकमतानुसार वीरमन्त्रदिसम्मत उपासना ,वैरी को दण्ड , शस्त्राभ्यास , गमन , पशुविक्रय , ईट , पत्थर , काठ तथा रत्नादि का घिसना और छीलना , संगीत अभ्यास , यन्त्र -तन्त्र बनाना , किले और पहाड पर चढना हाथी -घोडा तथा रथा आदि की सवारी सीखना व्यायाम षट्‌कर्मसाधन , यक्षिणी -बेताल , तथा भूतदिसाधन , औषध , सेवन , लिपि -लेखन ,दान ,क्रय -विक्रय , युद्ध , भोग , राजदर्शन , स्नानापार आदि।
दोनों नासिका (सुषुम्ना नाडी ) का श्वासफलदोनों नासा छिद्रों से श्वास चलने के समय किसी प्रकार का शुभ या अशुभ कार्य नहीं करना चाहिये । उस समय कोई भी काम करने से वह निष्फल होगा । उस समय योगाभ्यास और ध्यानधारणादि के द्वारा केवल भगवान् ‍ को स्मरण करना उचित है । सुषुम्ना नाडी से श्वास चलने के समय किसी को भी शाप या वरप्रदान करने पर वह सफल होता नहीं है ।
इस प्रकार श्वास -प्रश्वास की गति जानकर , जत्त्वज्ञान के अनुसार , तिथि -नक्षत्र के अनुसार , ठीक -ठोक नियमपूर्वक सब कर्मो को करने पर आशाभङुजनित मनस्ताप आदि नहीं भोगना पडता ।
रोगोत्पत्ति का पूर्ण ज्ञान और उसका प्रतीकारप्रतिपदा आदि तिथियों को यदि निश्चित नियम के विरुद्ध श्वास चले तो समझना चाहिये कि निस्संदेह कुछ अमङुल होगा । जैसे ,
१ . शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को सबेरे नींद टूटने पर सूर्योदय के समय पहले यदि दाहिनीं नाक से श्वास चलना आरम्भ हो तो उस दिन से पूर्णिमा तक के बीज गर्मी के कारण शरीर में कोई पीडा होगी और
२ . कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्योदय के समय पहले बायीं नाक से श्वास चलना आरम्भ हो तो उस दिन से अमावस्या तक के अंदर कफ या सर्दि के कारण कोई पीडा होगी , इसमें संदेह नहीं ।
दो पखवाडों तक इसी प्रकार विपरीत ढंग से सूर्योदय के समय निःश्वास चलता रहे तो किसी आत्मीय स्वजन को भारी बीमारी होगी अथवा मृत्यु होगी या और किसी प्रकार की विपत्ति आयेगी । तीन पखवाडों से ऊपर लगातार गडबड होने पर निश्चय ही अपनी मृत्यु हो जायेगी ।
प्रतीकार --- शुक्ल अथवा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल यदि इस प्रकार विपरीत ढंग से निःश्वास चलने का पता लग जाय तो उस नासिका को कई दिनों तक बंद रखने से रोग उत्पन्न होने की सम्भावना नहीं रहती । उस नासिका को इस तरह बंद रखना चाहिये , जिसमें उससे निःश्वास न चले । इस प्रकार कुछ दिनों तक दिन -रात निरन्तर (स्नान और भोजन का समय छोडकर ) नाक बंद रखने से उक्त तिथियों के भीतर बिलकुल ही कोई रोग नहीं होगा ।
यदि असावधानी के कारण निःश्वास में गडबडी हो और कोई रोग उत्प्न्न हो जाय तो जब तक रोग दूर न हो जाय , तब तक ऐसा करना चाहिये कि जिससे शुक्लपक्ष में दाहिनी और कृष्णपक्ष में बायीं नासिका से श्वास न चले । ऐसा करने से रोग शीघ्र दूर हो जायगा और यदि कोई भारी रोग होने की सम्भावना होगी तो वह भारी न होकर बहुत सामान्य रुप में होगा और फिर थोडे ही दिनों में दूर हो जायगा । ऐसा करने से न तो रोगजनित कष्ट भोगना पडेगा और न चिकित्सक को धन ही देना पडेगा ।
नासिका बन्द करने का नियमनाक के छेद में घुस सके इतनी -सी पुरानी रुई लेकर उसकी गोल पोटली -सी बना ले और उसे साफ बारीक कपडे से लपेटकर सी ले । फिर इस पोटली को नाक के छिद्र में घुसाकर छिद्र को इस प्रकार बन्द कर दे जिसमें उस नाम से श्वास -प्रश्वास का कार्य बिल्कुल ही न हों । जिन लोगों को कोई शिरो रोग है अथवा जिनका मस्तक दुर्बल हो , उन्हें रुई से नाक बंद न कर , सिर्फ साफ पतले कपडे की पोटली बनाकर उसी से नाक बंद करनी चाहिये ।
किसी भी कारण से हो , जितने क्षण या जितने दिन नासिका बंद रखने की आवश्यकता हो उतने क्षण या उतने दिनों तक अधिक अरिश्रम का कार्य , धूम्रपान , जोर से चिल्लाना , दौडना आदि नहीं करना चाहिये । जब जिस -किसी कारण से नाक बन्द रखने की आवश्यकता हो , तभी इन नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये । नयी अथवा बिना साफ की हुई मैली रुई नाक में कभी नहीं डालनी चाहिये ।
निःश्वास बदलने की विधिकार्यभेद से तथा अन्यान्य अनेक कारणों से एक नासिका से दूसरी नासिका में वायु की गति बदलने की भी आवश्यकता हुआ करती है । कार्य के अनुकूल नासिका से श्वास चलना आरम्भ होने तक , उस कार्य को न करके चुपचाप बैठे रहना किसी के लिये भी सम्भव नहीं । अतएव अपनी इच्छानुसार श्वास की गति बदलने की क्रिया सीख लेना नितान्त आवश्यक है । इसकी क्रिया अत्य्न्त सहज है , सामान्य चेष्टा से ही श्वास की गति बदली जा सकती है ।
१ . जिस नासिका से श्वास चलता हो , उसके विपरीत दूसरी नासिका को अँगूठे से दबा देना चाहिये और जिससे श्वास चलता हो उसके द्वारा वायु खींचना चाहिये । फिर उसको दबाकर दूसरी नासिका से वायु को निकालना चाहिये । कुछ देर तक इसी तरह एक से श्वास लेकर दूसरी से निकालते रहने से अवश्य श्वास की गति बदल जायगी ।
२ . जिस नासिका से श्वास चलता हो उसी करवट सोकर यह क्रिया करने से बहुत जल्द श्वास की गति बदल जाती है और दूसरी नासिका में श्वास प्रवाहित होने लगता है । इस क्रिया के बिना भी जिस नाक से श्वास चलता है , केवल उस करवट कुछ समय तक सोये रहने से भी श्वास की गति पलट जाती है ।
इस प्रकार जो अपनी इच्छानुसार वायु को रोक सकता है और निकाल सकता है वही पवन पर विजय प्राप्त करता है ।

स्वरोदय विज्ञान (भाग-2)


स्वरों के प्रवाह की लम्बाई के विषय में थोड़ी और बातें बता देना यहाँ आवश्यक है और वह यह कि हमारे कार्यों की विभिन्नता के अनुसार इनकी लम्बाई या गति प्रभावित होती है। जैसे गाते समय12 अंगुलखाना खाते समय 16 अंगुलभूख लगने पर 20 अंगुल,सामान्य गति से चलते समय 18 अंगुलसोते समय 27 अंगुल से30 अंगुल तकमैथुन करते समय 27 से 36 अंगुल और तेज चलते समय या शारीरिक व्यायाम करते समय इससे भी अधिक हो सकती है। यदि बाहर निकलने वाली साँस की लम्बाई नौ इंच से कम की जाए तो जीवन दीर्घ होता है और यदि इसकी लम्बाईबढ़ती है तो आन्तरिक प्राण दुर्बल होता है जिससे आयु घटती है। शास्त्र यहाँ तक कहते हैं कि बाह्य श्वास की लम्बाई यदि साधक पर्याप्त मात्रा में कम कर दे तो उसे भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है और यदि कुछ और कम कर ले तो वह हवा में उड़ सकता है। 
अब थोड़ी सी चर्चा तत्वों और नक्षत्रों के सम्बन्ध पर आवश्यक है। यद्यपि इस सम्बन्ध में स्वामी राम मौन हैं। इसका कारण हो सकता है स्थान का अभाव क्योंकि अपनी पुस्तक में उन्होंने केवल एक अध्याय इसके लिए दिया है। फिर भी पाठकों की जानकारी के लिए शिव स्वरोदय के आधार पर यहाँ तत्वों औरनक्षत्रों के सम्बन्ध नीचे दिये जा रहे हैं। पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध रोहिणीअनुराधाज्येष्ठाउत्तराषाढ़श्रवणधनिष्ठा और अभिजित सेजल तत्व का आर्द्राश्लेषामूलपूर्वाषाढ़शतभिषाउत्तरा भाद्रपद और रेवती सेअग्नि तत्व का भरणीकृत्तिकापुष्य,मघापूर्वा फाल्गुनीस्वाती और पूर्वा भाद्रपद तथा वायु तत्व का अश्विनीमृगशिरापुनर्वसुउत्तरा फाल्गुनीहस्तचित्रा और विशाखा से है। 
इस विज्ञान पर आगे चर्चा के पहले शरीर में प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह की दिशा की जानकारी आवश्यक है। यौगिक विज्ञान के अनुसार मध्य रात्रि से मध्याह्न तक प्राण नसों में प्रवाहित होता हैअर्थात् इस अवधि में प्राणिक ऊर्जासर्वाधिक सक्रिय होती है और मध्याह्न से मध्य रात्रि तक प्राण का प्रवाह शिराओं में होता है। मध्याह्न और मध्य रात्रि में प्राण का प्रवाह दोनों नाड़ी तंत्रों में समान होता है। इसी प्रकार सूर्यास्त के समय प्राण ऊर्जा का प्रवाह शिराओं में और सूर्योदय के समय मेरूदण्ड में सबसे अधिक होता है। इसीलिए शास्त्रों में ये चार संध्याएँ कहीं गयी हैं जो आध्यात्मिक उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं। यदि व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ है तो उक्त क्रम से नाड़ी तंत्रों में प्राण का प्रवाह संतुलित रहता है अन्यथा हमारा शरीर बीमारियों को आमंत्रित करने के लिये तैयार रहता है। यदि इडा नाड़ी अपने नियमानुसार प्रवाहित होती है तो चयापचय जनित विष शरीर से उत्सर्जित होता रहता हैजबकि पिंगला अपने क्रम से प्रवाहित होकर शरीर को शक्ति प्रदान करती है। योगियों ने देखा है और पाया है कि यदि साँस किसी एक नासिका से 24 घंटें तक चलती रहे तो यह शरीर में किसी बीमारी के होने का संकेत है। यदि साँस उससे भी लम्बे समय तक एक ही नासिका में प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि शरीर में किसी गम्भीर बीमारी ने आसन जमा लिया है और यदि यह क्रिया दो से तीन दिन तक चलती रहे तो निस्संदेह शीघ्र ही शरीर किसी गंभीरतम बीमारी से ग्रस्त होने वाला है। ऐसी अवस्था में उस नासिका से साँस बदल कर दूसरी नासिका से तब तक प्रवाहित किया जाना चाहिए जब तक प्रात:काल के समय स्वर अपने उचित क्रम में प्रवाहित न होने लगे। इससे होने वाली बीमारी की गंभीरता कम हो जाती है और व्यक्ति शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करता है। 
स्वरोदय विज्ञान के अनुसार स्वरों के प्रवाह की तिथियाँअवधि आदि का जो विवरण ऊपरदिया गया है वह केवल स्वस्थ शरीर होने पर ही सम्भव है। यदि इसमें विपर्यय हो अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदाद्वितीया और तृतीया को सूर्योदय के समय बाएँ स्वर के स्थान पर दाहिना स्वर चले तो समझना चाहिए कि शरीर में ताप का संतुलन बिगड़ गया है और यदि कृष्ण पक्ष में उक्त तिथियों को इड़ा नाड़ी चले अर्थात् बायीं नासिका से स्वास प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि शरीर का शीतलीकरण तंत्र असंतुलित हो गया है। स्वासों में उत्पन्न यह विपर्यय बुखार या सर्दी-खाँसी से ग्रस्त होने का संकेत देता है। इसके अतिक्ति यह असंतुलनउसमें निराशा और चिड़चिड़ापन को जन्म देता है। यदि यह क्रम तीन पखवारे तक बना रहे तो व्यक्ति गंभीर बीमारी का शिकार बनेगा।
अगर किसी को बुखार आ जाये या ऐसा लगे कि बुखार आने वाला हैतो उसे अपने स्वर की जाँच करके मालूम करना चाहिए कि साँस किस नासिका से प्रवाहित हो रही हैं। जिस नासिका से साँस चल रही हो उसे तुरन्त बन्द कर दूसरी नासिका से साँस तब तक चलायी जाये जब तक बुखार उतर न जाये या व्यक्ति सामान्य अनुभव न करने लगे। इस प्रकार स्वरों के माध्यम से बीमारियों की चिकित्सा उनके उग्र होने के पहले ही की जा सकती हैं।
स्वरोदय विज्ञान की जानकारी से हम दैनिक जीवन में काफी लाभान्वित हो सकते हैं। इसके लिए स्वरोदय विज्ञान के अनुसार हमें विभिन्न कार्य किस स्वर के प्रवाह काल में करना चाहिए यह जानना बहुत आवश्यक है। स्वर विशेष के प्रवाह काल में निर्धारित कार्य करने से हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा और साथ ही हमें कार्य विशेष में सफलता भी मिलेगी। इसके लिए सबसे पहले हम लेते हैं सूर्य नाड़ी अर्थात् पिंगला को।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि सूर्य नाड़ी अपने प्रवाह काल में हमें शक्ति प्रदान करती है इसलिए जब साँस दाहिनी नासिका से प्रवाहित हो उस समय कठिन कार्य करना चाहिए। इसमें गूढ़ और कठिन विद्याओं का अध्ययनशिकार करनावाहनों की सवारीफसल काटना,कसरत करनातैरना आदि सम्मिलित हैं। पिंगला के प्रवाह में जठराग्नि प्रबल होती है। इसलिए जब दाहिनी नासिका से स्वर चले तो भोजन करना चाहिए और भोजनोपरान्त कम से कम दस से पन्द्रह मिनट तक बाँई करवट लेटना चाहिएताकि सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो। शौच और शयन पिंगला के प्रवाह काल में स्वास्थ्यप्रद होता है। वैसे स्वरोदय विज्ञान के अनुसार यात्रा के लिए कहा गया है कि जो स्वर चल रहा हो वही पैर घर से पहले निकालकरयात्रा की जाये तो वह निर्विघ्न पूरी होती है। किन्तु दाहिना स्वर चले तो दक्षिण और पश्चिम दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। वैसे लम्बी दूरी की यात्रा पिंगला नाड़ी के चलने पर शुरू नहीं करनी चाहिए। स्त्री समागम आदि के लिए पिंगला नाड़ी का चयन करना चाहिए। कुल मिलाकर संक्षेप में यह कहना है कि अधिक श्रमसाध्य अस्थायी कार्य पिंगला नाड़ी के प्रवाह काल में प्रारम्भ करना चाहिए।
जब इडा नाड़ी चले तो सभी शुभ एवं स्थायी कार्य प्रारम्भ करने चाहिए। जैसे लम्बी यात्रागृह निर्माणनयी विद्याओं का अध्ययनबीज वपनसामान एकत्र करनाजनहित का कार्य,चिकित्सा कराना आदि। इडा नाड़ी के प्रवाहकाल में लम्बी यात्रा के प्रारम्भ करने का उल्लेख किया गया है। लेकिन उत्तर और पूर्व दिशा की यात्रा का प्रारम्भ करना वर्जित है। इसके अतिरिक्त जल पीनालघुशंका करनापरोपकारश्रेष्ठ एवं वरिष्ठ व्यक्तियों से सम्पर्कगुरू दर्शन,मंत्र-साधनापुरूष समागम आदि कार्य के लिए इडा नाड़ी का प्रवाह काल चुनना चाहिए। वैसे,स्वरोदय विज्ञान के अनुसार भोजन के लिए पिंगला नाड़ी सर्वोत्तम कहीं गयी हैलेकिन अधिक मसालेदारवसायुक्त नमकीन या खट्टे भोजन के लिए इडा नाड़ी का प्रवाह काल उत्तम माना गया हैक्योंकि यह शरीर में चयापचय से उत्पन्न विष को उत्सर्जित करने में सक्षम है।
सुषुम्ना नाड़ी का प्रवाह काल आध्यात्मिक साधना अर्थात् ध्यान आदि के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसके अतिरिक्त यदि कोई अन्य कार्य इस काल में प्रारम्भ करते हैं तो उसमें सफलता नहीं मिलेगी। यदि अभ्यास द्वारा ऐसा कुछ किया जा सके जिससे सुषुम्ना नाड़ी का प्रवाह-काल बढ़ सके और उस समय आध्यात्मिक साधना की जायेविशेषकर उस समय आकाश तत्व का उदय हो (यह एक विरल संयोग है)तो साधक को दुर्लभ और विस्मयकारी अनुभव होंगे।

दैनिक जीवन में जैसे कार्य का प्रारम्भ उपर्युक्त ढंग से करके स्वास्थ्य लाभ एवं सफलता प्राप्त करने की बात कही गई हैवैसे ही स्वरों के साथ उनमें प्रवाहित होने वाले पंच तत्वों का विचार करना भी अत्यन्त आवश्यक है। अन्यथा असफलता ही हाथ लगेगी। अतएव स्वरों के साथ उक्त विधान का प्रयोग करते समय उनमें प्रवाहित होने वाले तत्वों की पहिचान करना और तद्नुसार कार्य करना आवश्यक है। 
भौतिक उन्नति या दीर्घकालिक सुख से सम्बन्धित कार्य या स्थायी शान्तिप्रद कार्यों में प्रवृत्त होते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि उपयुक्त स्वर में पृथ्वी तत्व का उदय हो। अन्यथा अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। शास्त्रों का कथन है कि पृथ्वी तत्व की प्रधानता के साथ हमारा मन भौतिक सुख के कार्यों के प्रति अधिक आकर्षित होता है। किसी भी स्वर में जल तत्व के उदय के समय किया गया कार्य तत्काल फल देने वाला होता हैभले ही फल अपेक्षाकृत कम हो। जल तत्व की प्रधानता होने पर परिणाम जल की तरह चंचल और उतार-चढ़ाव से भरा होता है। इसलिए इस समय ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिसमें अधिक भाग-दौड़ करना पड़े। अग्नि तत्व का धर्म दाहकता है। इसलिए इसके उदयकाल मेंकोई भी कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए क्योंकि असफलता के अलावा कुछ भी हाथ नहीं आयेगा। यहाँ तक कि इस समय किसी बात पर अपनी राय भी नहीं देनी चाहिएअन्यथा अप्रत्याशित कठिनाई में फॅंसने की नौबत भी आ सकती है। धन-सम्पत्ति से संबंधित दुश्चिन्ताएंपरेशानियाँवस्तुओं का खोना आदि घटनाएँ अग्नितत्व के उदयकाल में ही सबसे अधिक होती हैं। वायु तो सर्वाधिक चंचल है। अतएव इसके उदयकाल में किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता। स्वामी सत्यानन्द जी ने अपनी पुस्तक 'स्वर-योगमें एक अद्भुत उदाहरण दिया है और वह हमें वायु तत्व के समय कार्य का चुनाव करने में सहायक हो सकता है। उन्होंने लिखा है कि यदि भीड़-भाड़ वाले प्लेटफार्म पर छूटती गाड़ी पकड़ने के लिए झपटते समय और वायु तत्व का उदय हो तो आप ट्रेन पकड़ने में सफल हो सकते हैं। आकाश तत्व के उदय काल में ध्यान करने के अलावा कोई भी कार्य सफल नहीं होगायह ध्यान देने योग्य बात है। 
संक्षेप मेंयह ध्यान देने की बात है कि इडा और पिंगला स्वर में पृथ्वी तत्व और जल तत्व का उदयकाल कार्य के स्वभाव के अनुकूल स्वर का चुनाव सदा सुखद होगा। इडा स्वर में अग्नि तत्व और वायु तत्व का उदयकाल अत्यन्त सामान्य फल देनेवाला तथा पिंगला में विनाशकारी होता हैं। आकाश तत्व का उदय काल केवल ध्यान आदि कार्यों में सुखद फलदाता है। 
'शिव स्वरोदयका कथन है कि दिन में पृथ्वी तत्व और रात में जल तत्व का उदयकाल सर्वोत्तम होता है। इससे मनुष्य स्वस्थ रहता है और सफलता की संभावना सर्वाधिक होती है।
आवश्यकतानुसार स्वर को बदलने के कुछ सरल तरीके नीचे दिए जा रहे हैं।:-

(क) जिस स्वर को चलाना हो उसके उलटे करवट सिर के नीचे हाथ रखकर लेटने से स्वर बदल जाता हैअर्थात् यदि दाहिनी नासिका से स्वर प्रवाहित करना हो तो बायीं करवट थोड़ी देर तक लेटने से पिंगला नाड़ी चलने लगेगी। वैसे हीदाहिनी करवट लेटने से इडा नाड़ी चलने लगती है।

(ख) जिस नासिका से साँस प्रवाहित करना चाहते हैं एक नाक बंद कर उस नाक से दस-पन्द्रह बार साँस दबाव के साथ धीरे-धीरे छोड़े और लें तो स्वर बदल जाता है।

(ग) फर्श पर बैठकर एक पैर मोड़कर घुटने को बगल में थोड़ी देर तक दबाए रहें और दूसरा फर्श पर सीधा रखें तो थोड़ी देर में जो पैर सीधा है उस नासिका से साँस चलने लगेगी।

(घ) फर्श पर बैठकर एक हाथ जमीन पर रखें और उसी ओर के कंधें को दीवार से लगाकर थोड़ी देर तक दबाए रखने से स्वर बदल जाता है।

(ड.) लम्बे समय तक यदि किसी एक स्वर को चलाने की आवश्यकता पड़े तो उक्त तरीकों से स्वर बदल कर शुध्द रूई की छोटी गोली बनाकर साफ कपड़े से लपेट कर सिली हुई गुलिका द्वारा एक नाक को बन्द कर देना चाहिए।

जिस प्रकार विभिन्न कार्यों का सम्पादन करने के लिए स्वर बदलने की आवश्यकता पड़ती हैवैसे ही तत्वों को बदलने की भी आवश्यकता भी पड़ती है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति में एक स्वर की एक घंटें की अवधि के दौरान सर्वप्रथम वायु तत्व आठ मिनट तक प्रवाहित होता हैजिसकी लम्बाई नासिका पुट से आठ अंगुल (6 इंच) मानी गयी है। इसके बाद अग्नि तत्व बारह मिनट तक प्रवाहित होता है जिसकी लम्बाई चार अंगुल या 3इंच तक होती है। तीसरे क्रम में पृथ्वी तत्व 20 मिनट तक प्रवाहित होता है और इसकी लम्बाई बारह अंगुल या नौ इंच तक होती है। इसका विवरण इसके पहले दिया जा चुका है। यहाँ संदर्भ के लिए इसलिए लिया गया है ताकि यह समझा जा सके कि तत्वों के प्रवाह को बदलने के उनकी लम्बाई का ज्ञान और अभ्यास होना आवश्यक है और यदि हम स्वर की लम्बाई को तत्वों के अनुसार कर सकें तो स्वर में वह तत्व प्रवाहित होने लगता है।

स्वरोदय विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म एवं जटिल विज्ञान है। इसका अभ्यास इस विज्ञान के सुविज्ञ गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। क्योंकि इसके अभ्यास द्वारा अत्यन्त अप्रत्याशित और अलौकिक अनुभव होते हैंजो हमारे मानसिक संतुलन को बिगाड़ सकते है। इस निबन्ध का उद्देश्य मात्र स्वरोदय विज्ञान से परिचय कराना है और साथ ही यह बताना कि अपने दैनिक जीवन मेंजैसा कि ऊपर संकेत किया गया हैइसकी सहायता निरापद ढंग से कैसे ली जा सकती है अर्थात् जिसके लिए इस विज्ञान के गहन साधना की आवश्यकता नहीं है।